इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा (57) ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित घर में लगी आग में 500-500 के नोटों के बंडल जले मिले थे। इस विवाद के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था। उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली थी। हालांकि, उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। जब तक उनके खिलाफ चल रही जांच पूरी नहीं हो जाती, उन्हें न्यायिक कामों से दूर रखा गया था। कैश कांड में नाम आने के बाद उनके खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को चुनौती दी थी। याचिका में कहा था कि दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन राज्यसभा ने उसे मंजूर नहीं किया। इसके बावजूद लोकसभा ने अकेले जांच समिति बना दी, जो उनके अनुसार गलत है। फिर इसी साल 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जांच समिति के गठन में कुछ खामियां दिखाई देती हैं। हालांकि कोर्ट यह देखेगा कि क्या यह खामी इतनी गंभीर है कि पूरी कार्यवाही को रद्द किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी को यशवंत वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने दो दिन की सुनवाई के बाद यह निर्णय लिया। हालांकि बेंच ने जस्टिस वर्मा को पार्लियामेंट्री कमेटी के सामने जवाब दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने से मना कर दिया। 7 जनवरी- सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय जांच पैनल में खामी बताई
7 जनवरी को कोर्ट ने कहा था कि लोकसभा स्पीकर की ओर से गठित संसदीय जांच पैनल में कुछ खामी दिखाई देती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत लोकसभा स्पीकर के पास यह अधिकार है कि वह जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित कर सकें, भले ही राज्यसभा में ऐसा ही प्रस्ताव खारिज हो चुका हो। 16 दिसंबर 2025- कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर को नोटिस दिया इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर 2025 को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को नोटिस जारी किया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और एजे मसीह की बेंच ने लोकसभा स्पीकर कार्यालय और दोनों सदनों के महासचिवों से जवाब मांगा था। जस्टिस दत्ता ने पूछा था- राज्यसभा में प्रस्ताव नामंजूर हुआ फिर भी लोकसभा में समिति बनाई गई। संसद में इतने सारे सांसद और कानूनी विशेषज्ञ मौजूद थे, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, संसद में मौजूद कानूनी विशेषज्ञों ने इसे होने कैसे दिया? याचिका में दावा- जांच पैनल भारतीय संविधान का उल्लंघन 7 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनल कमेटी की रिपोर्ट और CJI खन्ना की सिफारिश के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने 1968 के जज जांच कानून के तहत शुरू हुई कार्रवाई को चुनौती देते हुए नई याचिका दायर की है। लोकसभा अध्यक्ष ने जज (जांच) कानून 1968 की धारा 3(2) के तहत के जांच पैनल बनाया, जिसे संविधान के खिलाफ बताया गया है। याचिका में 12 अगस्त 2025 की लोकसभा स्पीकर की कार्रवाई को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने की मांग की गई है। जस्टिस वर्मा के वकील ने कहा कि जज को हटाने से जुड़े प्रस्ताव लाने से पहले लोकसभा और राज्यसभा दोनों मिलकर जांच समिति बनाएं सिर्फ लोकसभा स्पीकर अकेले यह कमेटी न बनाए। इससे पहले तीन हाईकोर्ट जजों की जांच में जस्टिस वर्मा दोषी पाए गए और उन्हें हटाने की सिफारिश हुई थी। इसके बाद सरकार ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव रखा, जिसे 146 सांसदों के समर्थन के साथ अध्यक्ष ने मंजूर कर लिया। संसद में महाभियोग लाने की प्रक्रिया क्या है… जजों की जांच के कानून के बारे में जानें… 1968 के जजों (जांच) अधिनियम के मुताबिक जब किसी जज को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में मंजूर हो जाता है तो स्पीकर या चेयरमैन उस आरोप की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाते हैं। ————————– ये खबर भी पढ़िए- सुप्रीम कोर्ट बोला-मेरठ का मामला देश के लिए चेतावनी:जिंदगी की कीमत पर व्यवसाय नहीं चलेगा, 859 संपत्तियों को तोड़ने के आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने गुरुवार को 859 संपत्तियों पर बने अवैध सेटबैक को दो महीने के भीतर तोड़ने का आदेश दिया है। अवैध सेटबैक यानी इमारत के चारों ओर छोड़ी जाने वाली अनिवार्य खाली जगह में किया गया निर्माण। लाइव लॉ के मुताबिक, कोर्ट ने कहा- मामला सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के लिए चेतावनी है। अगर प्रशासन ने समय रहते कदम उठाए होते, तो इतनी बड़ी समस्या पैदा नहीं होती।कानून का राज लोगों के शोर-शराबे के आगे झुक नहीं सकता है। व्यवसाय किसी की जिंदगी की कीमत पर नहीं चल सकता है। पढ़ें पूरी खबर…
