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छोटे पड़ रहे टाइगर रिजर्व:मध्यप्रदेश में कुल 785 बाघ, 5 साल में 220 की मौत, इनमें 92 ने जंगल के बाहर तोड़ा दम

मप्र में सबसे ज्यादा 785 बाघ हैं और उनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऋचिंता यह है कि उनका ‘घर’ यानी जंगल सिमट रहा है। पिछले वर्षों में जंगल का दायरा और गुणवत्ता दोनों घटी हैं- कारण हैं विकास कार्य, वन भूमि में बदलाव और कब्जे। बढ़ती आबादी के साथ बाघ अपने रहवास का दायरा बढ़ा रहे हैं और नए प्राकृतिक आवास की तलाश में बाहर निकल रहे हैं। यही वजह मानी जा रही है कि पिछले पांच साल में हुई 220 बाघ मौतों में से 92 (42%) टाइगर रिजर्व के बाहर हुईं। इसके अलावा, गर्मी का मौसम बाघों और अन्य वन्यजीवों के लिए सबसे कठिन साबित हो रहा है। मार्च से जून के बीच जंगलों के प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगते हैं, जिससे पानी और शिकार की तलाश में बाघ अक्सर अपने क्षेत्र से बाहर निकलकर खेतों और आबादी वाले इलाकों तक पहुंच जाते हैं। इस दौरान वे संघर्ष, करंट और खेतों में लगाए फंदों जैसे कई खतरों में फंस जाते हैं। कई बार क्षेत्र और भोजन को लेकर बाघों के बीच घातक संघर्ष भी हो जाता है। इन सब के बीच कई बार बाघों की मौत भी हो जाती है। जिन केसों में बाघ की मौत की सूचना देर से मिलती है। ऐसे अधिकांश केसों में मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो पाता। क्योंकि मौत के बाद शवों में कीड़े पड़ जाते हैं। शव सड़ गल जाते हैं। जिससे पहचान होना कठिन है। जंगल में नियमित निगरानी सुनिश्चित होनी चाहिए। ताकि बाघों की मृत्यु का पता जल्द चल सके। जंगलों में बारहमासी जलस्त्रोत, बेहतर पर्यावास विकास और सख्त निगरानी व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है। ताकि बाघों की अप्राकृतिक मौतें रोकी जा सकें। सीधी बात: सुभरंजन सेन, पीसीसीएफ सवाल: बाघ टाइगर रिजर्व क्यों छोड़ रहे हैं?
जवाब: बाघ टाइगर रिजर्व से बाहर नहीं निकलते। लगभग 30% बाघ रिजर्व के बाहर प्राकृतिक रूप से रहते हैं, इसलिए रिजर्व के बाहर बाघों की मृत्यु होना स्वाभाविक है। सवाल: जंगल का दायरा क्यों घट रहा है?
जवाब: हम इंसान बाघों के घर यानी जंगल में घुस रहे हैं। इससे जंगल सिमट रहा है। सवाल: बाघों की मौत के बाद पहचान में देरी क्यों होती है?
जवाब: कुछ मामलों में प्रयोगशाला रिपोर्ट में समय लगता है। साथ ही, बाघ के शरीर के अंगों को जब्त करने पर जांच की प्रकृति के कारण इसमें समय लग सकता है। 21 फीसदी शावकों की हुई मौत नोट- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण नियमों के तहत हर बाघ की मौत को शुरुआत में शिकार मानकर जांच की जाती है, बाद में पोस्टमार्टम व फोरेंसिक से कारण तय होता है। अब तक 72.6% मामलों की जांच बंद हो चुकी है, जबकि 27.4% मामले अभी लंबित हैं। देश में सर्वाधिक बाघों की मौत मप्र में, 96 की पहचान नहीं, क्योंकि शव पुराना था
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के अनुसार 2021 से 2025 के बीच देश में 729 बाघों की मौत हुई, जिनमें सर्वाधिक 220 मध्यप्रदेश में दर्ज की गईं। चिंताजनक तथ्य यह है कि 96 बाघों की पहचान तक नहीं हो सकी। न उम्र पता चली, न यह कि वे नर थे या मादा। सवाल है कि मौत के बाद पूरा रिकॉर्ड क्यों नहीं बन पाया। दो दिन से अधिक पुराने शवों की पहचान कठिन हो जाती है, जिससे निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। जंगलों में नियमित मॉनिटरिंग, बारहमासी जलस्रोत, बेहतर पर्यावास विकास और सख्त निगरानी जरूरी है, ताकि अप्राकृतिक मौतें रोकी जा सकें। 60% बाघ ही टाइगर रिजर्व में रह रहे हर साल 16 हजार मवेशियों का शिकार
टाइगर रिजर्व के बाहर या बफर क्षेत्र में बाघ द्वारा मवेशियों के शिकार के मामले हर साल बढ़ रहे हैं। जो बातें हैं कि बाघ टाइगर रिजर्व के बाहर अपनी गतिविधि बढ़ा रहे हैं। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2022 से 2025 के बीच बाघों ने हर साल औसतन 16 हजार मवेशियों का शिकार किया है। मवेशी मालिकों को मुआवजा दिया। वन्यजीवों के हमले में औसतन हर साल 700 लोग घायल हुए इन्हें भी मुआवजा दिया जाता है।

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