वह घर का इकलौता कमाने वाला लड़का था। उसकी शादी भी नहीं की थी। उस दिन बिना किसी वजह, बिना शिकायत के पुलिस वाले आए और मेरे बेटे को उठा ले गए, फिर उसकी लाश ही घर आई। उन्होंने कहा कि उसने फांसी लगाई, लेकिन उन्होंने मेरे बेटे को मारा है। यह कहते हुए राजेश पटेल की मां की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। उनकी आवाज भर्रा जाती है और वह आगे कहती हैं, “मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा, मैं आगे बात नहीं कर पाऊंगी।” दरअसल, राजेश की 14 फरवरी को पुलिस कस्टडी में मौत हो गई थी। परिजन के मुताबिक राजनगर थाने की पुलिस राजेश को इमिलिया गांव से उठाकर ले गई थी। शाम होते-होते परिवार तक खबर पहुंची कि राजेश अब इस दुनिया में नहीं है। पुलिस ने अपनी कहानी में बताया कि राजेश ने थाने के महिला कक्ष में खिड़की की ग्रिल से फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली है, लेकिन परिवार और गांव वाले इसे सिरे से खारिज कर रहे हैं। उनका सीधा आरोप है कि पुलिस ने राजेश की बर्बरता से पिटाई की, उसे छोड़ने के लिए 50,000 रुपए की रिश्वत मांगी। जब परिवार पैसे का इंतजाम कर रहा था, तब तक पीट-पीटकर उसकी हत्या कर दी। इस मामले में अब तक दो कॉन्स्टेबल और थाना प्रभारी को निलंबित कर दिया गया है और मामले की मजिस्ट्रियल जांच जारी है। आखिर राजेश पटेल को किस अपराध में थाने लाया गया था? क्या उसके खिलाफ कोई शिकायत या एफआईआर दर्ज थी? उसकी मौत की असली वजह क्या है? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए दैनिक भास्कर की टीम इमिलिया गांव पहुंची। ग्रामीण और परिजन के साथ जिम्मेदारों से बात की। पढ़िए रिपोर्ट
इमिलिया गांव में पसरा मातम
भास्कर की टीम छतरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर इमिलिया गांव पहुंची, तो गांव में खामोशी छाई हुई थी। जब हमने राजेश पटेल के घर का पता पूछा, तो एक ग्रामीण ने गांव के अंदर की ओर इशारा कर दिया। हम जब राजेश के घर पहुंचे, तो वहां मातम पसरा था। एक छोटे से कच्चे घर के बाहर बड़ी संख्या में लोग खामोश बैठे थे। उन्हीं के बीच राजेश के पिता किशोरी लाल पटेल भी थे, जिनकी पथराई आंखें अपने जवान बेटे के खोने का दर्द बयां कर रही थीं। परिवार के लोग और पड़ोसी उन्हें ढांढस बंधाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनकी बातों में निराशा और बेबसी साफ झलक रही थी। उन्हें अब तक यह भी नहीं पता चल पाया है कि उनके बच्चे का कसूर क्या था? जिन पुलिसकर्मियों पर हत्या का आरोप है, उनके खिलाफ निलंबन के अलावा कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई? 14 फरवरी: उस मनहूस दिन की पूरी कहानी सुबह का मंजर: खेत से उठा ले गई पुलिस
उस दिन वास्तव में क्या हुआ था, यह जानने के लिए हमने गांव के ही रहने वाले और घटना के चश्मदीद धर्मेंद्र कुमार सोनी से बात की। धर्मेंद्र बताते हैं, ‘उस दिन सुबह मैं अपने घर के बाहर ही खड़ा था। तभी पुलिस की एक गाड़ी आई और राजेश के छोटे भाई राजन को पकड़ने लगी। हम सभी ने पूछा कि इसे क्यों पकड़ रहे हो, तो पुलिसवालों ने कहा कि जब तक राजेश नहीं मिलता, हम इसी को ले जाएंगे। हमने कहा कि राजेश खेत में है, हम आपको वहां ले चलते हैं, इसे छोड़ दो।” धर्मेंद्र और कुछ गांव वाले पुलिस को लेकर खेत की तरफ गए। वहां राजेश आराम से बैठकर पपीता खा रहा था। उसे इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं था कि अगले कुछ घंटे उसकी जिंदगी के आखिरी घंटे साबित होंगे। धर्मेंद्र बताते हैं, “राजेश को देखते ही पुलिस वालों ने उसे बिना कुछ कहे मारना शुरू कर दिया। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की और कहा कि जो भी मामला है, बात कर लीजिए, मारपीट क्यों कर रहे हैं। थाने में चीखें और रिश्वत का सौदा
राजेश के पिता किशोरी लाल पटेल कांपती आवाज में बताते हैं, जब हम थाने पहुंचे, तो बगल वाले कमरे से राजेश की चीखने की आवाजें आ रही थीं। वे लोग उसे बेरहमी से पीट रहे थे। हमने अंदर जाकर कहा कि हमारे बच्चे को मत मारिए, उसका गुनाह तो बताइए। लेकिन उन्होंने हमारी एक न सुनी। मैं अपने बच्चे की चीखें बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, इसलिए मैं थाने से थोड़ा दूर चला गया। धर्मेंद्र आगे बताते हैं कि जब वे लोग दोबारा अंदर गए और पुलिस वालों से मारपीट न करने की गुहार लगाई, तो वहां मौजूद अंकित द्विवेदी नाम के एक पुलिसकर्मी ने सौदा करना शुरू कर दिया। उसने कहा कि एक लाख रुपए दो और इसे ले जाओ। हमने कहा कि यह बहुत गरीब परिवार से है, इतने पैसे कहां से लाएगा? काफी मिन्नतों के बाद 50,000 रुपए में बात तय हुई। धर्मेंद्र याद करते हैं, “राजेश ने हमसे कहा था कि ये लोग मुझे मार डालेंगे। हमने उसे दिलासा दिया कि कुछ नहीं होगा, बात हो गई है, हम बस पैसे लेकर आ रहे हैं। तब तक उसके साथ मारपीट तो हुई थी, लेकिन उसकी हालत स्थिर लग रही थी। चूंकि पुलिस वाले ऑनलाइन पैसे लेने को तैयार नहीं थे और गरीब किशोरी लाल के पास उस वक्त जेब में दो-तीन हजार रुपये ही थे, इसलिए वे पैसे इकट्ठा करने के लिए गांव वापस चले गए। शाम का इंतजार और मौत की खबर
शाम को जब परिवार और गांव वाले पैसे का इंतजाम करके थाने पहुंचे, तो उन्हें यह कहकर बाहर ही रोक दिया गया कि अभी एसडीओपी साहब की गाड़ी अंदर खड़ी है, वो अंदर ही हैं। अभी कोई अंदर नहीं जाएगा, बाहर इंतजार करो। परिवार को लगा कि अब उनका बेटा छूट ही जाएगा, इसलिए वे पास की एक चाय की दुकान पर बैठकर इंतजार करने लगे। धर्मेंद्र बताते हैं,’देखते ही देखते थाने में कई पुलिस की गाड़ियां आने-जाने लगीं। हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है। शाम करीब 6 बजे हमें मीडिया के लोगों से पता चला कि थाने के अंदर राजेश की मौत हो गई है। यह सुनते ही हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई। हमने तुरंत गांव में फोन किया और देखते ही देखते सैकड़ों गांव वाले थाने में इकट्ठा हो गए। शव पर चोट के निशान और पुलिस का कवर-अप? चाचा का दावा: फांसी नहीं, यह हत्या है राजेश के चाचा बाबूलाल पटेल उस भयावह रात को याद करते हुए बताते हैं कि देर रात एसडीओपी और मजिस्ट्रेट साहब ने मुझे अंदर बुलाया। मैंने देखा कि राजेश एक खिड़की की ग्रिल से बंधा था और उकड़ू बैठा हुआ था। उसका शरीर जमीन पर था, हवा में लटका हुआ नहीं था। उन्होंने कहा कि तुम्हारे लड़के ने फांसी लगा ली है। मैंने तुरंत कहा कि साहब, अगर वह फांसी से मरता तो जमीन पर कैसे बैठा होता? उसका शरीर तो ऊपर लटका होता। बाबूलाल ने आगे बताया कि मैंने मजिस्ट्रेट साहब को दिखाया कि देखिए, इसके शरीर पर चोट के निशान साफ दिख रहे हैं, जो दिन में पिटाई से आए हैं। मैंने जब उसकी शर्ट उठाकर दोनों हाथ दिखाए, तो उन पर गहरे नीले निशान थे। चेहरे पर भी चोट थी। चचेरे भाई का खुलासा: पूरा शरीर चोटों से भरा था
राजेश के चचेरे भाई, लिखित पटेल ने जो बताया, वह और भी चौंकाने वाला है। जब हम राजेश को चिता पर ले जाने से पहले नहला रहे थे, तब मैंने उसके पूरे शरीर को ध्यान से देखा। शरीर में कई जगह बड़े-बड़े काले निशान बन गए थे। उसके दोनों हाथ-पैरों, सीने, पीठ और यहां तक कि पिंडलियों पर भी चोट के निशान थे। हम उसकी चोटों का वीडियो बनाना चाहते थे, लेकिन पुलिस वालों ने हमें ऐसा करने नहीं दिया। उस दिन गांव में इतनी पुलिस थी कि सब डरे हुए थे, इसलिए हम कुछ नहीं कर पाए। लेकिन मैंने अपनी आंखों से उसके शरीर की सारी चोटें देखी हैं। पुलिस की संदिग्ध भूमिका और अनसुलझे सवाल गिरफ्तारी से पहले की साजिश?
किशोरी लाल पटेल बताते हैं कि इस घटना से कुछ दिन पहले से ही दो लोग सिविल ड्रेस में गांव में घूम रहे थे और राजेश के बारे में पूछताछ कर रहे थे। जब गांव वालों ने यह बात बताई, तो उनके भाई और सरपंच ने राजनगर थाने जाकर थाना प्रभारी से पूछा कि राजेश को क्यों ढूंढा जा रहा है। आरोप है कि थाना प्रभारी ने उन्हें गाली देकर भगा दिया और कहा कि राजेश को ही भेजना, उसी को बताएंगे। इसके एक दिन बाद ही पुलिस ने उनके छोटे बेटे राजन को घर से घसीटने की कोशिश की, जिसे आधार कार्ड दिखाने के बाद छोड़ा गया। पुलिस का गोलमोल जवाब इस पूरी घटना में पुलिस की भूमिका शुरू से ही संदिग्ध रही है। पुलिस अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि राजेश को किस आरोप में उठाया गया था। वे केवल “प्रतिबंधात्मक कार्यवाही” की बात कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं बता रहे कि मामला क्या था और उसे 24 घंटे के भीतर एसडीएम के सामने क्यों पेश नहीं किया गया। ASP ने मानी ‘चूक’, पर हत्या से इनकार इस मामले में हमने छतरपुर के एएसपी आदित्य पाटले से बात की। सवाल: राजनगर थाने की घटना आत्महत्या है या हत्या?
जवाब: देखिए, यह एक कस्टोडियल डेथ है। हमने तुरंत जिला जज साहब को सूचित कर दिया था और अब इस मामले की ज्यूडिशियल जांच चल रही है। पीएम डॉक्टरों के पैनल द्वारा किया गया है और वीडियोग्राफी भी हुई है। प्रथम दृष्टया मामला फांसी का लग रहा है, लेकिन मृत्यु का असली कारण पीएम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा। सवाल: राजेश को किस आरोप में उठाया गया था?
जवाब: एक शिकायत आवेदन के आधार पर उसे लाया गया था। चूंकि मामला ज्यूडिशियल जांच में है, इसलिए अभी ज्यादा जानकारी नहीं दे सकते। सवाल: उसे महिला कक्ष में क्यों रखा गया, जहां कैमरा नहीं था?
जवाब: यह एक ‘लैप्स’ (चूक) है। महिला डेस्क में उनकी प्राइवेसी के कारण कैमरे नहीं होते। आरोपी को वहां रखना एक अनुशासनात्मक चूक है, जिसके लिए थाना प्रभारी को निलंबित किया गया है। सवाल: जिन आरक्षकों ने उसे उठाया, उनका तो पहले ही ट्रांसफर हो चुका था? जवाब: उनका तबादला हुआ था, लेकिन उनकी रवानगी नहीं डाली गई थी। यह भी थाना प्रभारी की चूक है, जिस पर कार्रवाई की गई है। दोनों आरक्षकों को भी निलंबित कर दिया गया है।
