कुक्षी तहसील के ग्राम बाकी में बांस की लकड़ियों पर नक्काशी कर ‘बोलनी’ (ओढ़ी) बनाने की परंपरा आज भी जीवित है। यहां के करीब 30 परिवार इस अनूठी आदिवासी कला को संजोए हुए हैं, जो न केवल उनकी संस्कृति का हिस्सा है, बल्कि रोजगार का बड़ा जरिया भी बन चुका है। आदिवासी संस्कृति में मांगलिक अवसरों पर बोलनी का खास महत्व होता है। भगोरिया जैसे बड़े त्योहारों में इसे विशिष्ट अतिथियों को भेंट किया जाता है और नृत्य के दौरान युवतियां इसे उठाकर थिरकती हैं। शादी में दूल्हे पक्ष के लिए बोलनी खरीदना जरूरी माना जाता है, जिसमें शादी का जरूरी सामान रखा जाता है। सिर पर बोलनी रखने वाली ‘चंद्ररेनी’ शादी की रस्मों के दौरान जब दूल्हे की बहन बाजार से गहने और चूड़ियां खरीदने जाती है, तो वह इस बोलनी को सिर पर रखकर चलती है। ऐसी लड़की को समाज में ‘चंद्ररेनी’ कहा जाता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। बारीक कारीगरी और आधुनिक बदलाव बांस के बम्बू को छीलकर गोल आकार की टोकनी बनाई जाती है, जिसे रंगीन कांच और सजावटी सामान से आकर्षक रूप दिया जाता है। अब कुछ कलाकार इसमें बेयरिंग लगाकर इसे घूमने वाला (रिवॉल्विंग) भी बना रहे हैं। एक बोलनी को तैयार करने में करीब दो दिन की मेहनत लगती है। कीमत और बाजार सजावट वाली बोलनी बाजार में 2,000 से 2,500 रुपए तक बिकती है, जबकि बिना सजावट वाली बोलनी 1,200 रुपए और सूप 300 रुपए में मिलते हैं। बाग में माताजी के हाट से इनकी बड़े पैमाने पर बिक्री शुरू होती है, जो शादी के मुहूर्त खत्म होने तक जारी रहती है। विरासत में मिला हुनर बाकी गांव के कलाकारों का कहना है कि यह हुनर उन्हें पूर्वजों से मिला है। घर में आने वाली बहुएं भी काम देखकर इस कला में माहिर हो जाती हैं। एक परिवार सीजन में लगभग 100 बोलनियां और 500 सूप तैयार कर लेता है। 30 फीट लंबे बांस को करीब 50 रुपए में खरीदकर वे अपनी मेहनत से इसे कीमती हस्तशिल्प में बदल देते हैं।
