सर, आप नंबर दीजिए। किसका डेटा चाहिए- बीवी, गर्लफ्रेंड, बिनजनेस पार्टनर या किसी नेता का? हम 6 महीने की कॉल डिटेल निकालकर दे देंगे। इसके अलावा टीडीएस और बैंक खातों की जानकारी भी दे देंगे। भास्कर के स्टिंग ऑपरेशन में एक डिटेक्टिव एजेंसी संचालक और उसके पार्टनर ने यह खुलासा किया। दोनों खुद को जासूस बताते हैं, लेकिन आड़ में लोगों का निजी डेटा बेच रहे हैं। भारतीय टेलीग्राफ एक्ट 1885 और आईटी एक्ट 2000 के तहत निजी जानकारी साझा करना अपराध है। इसमें 3 साल तक की जेल और 1 लाख से 2 करोड़ रुपए तक जुर्माना हो सकता है। इसके बाद भी इन्हें कानून का खौफ नहीं है। इन्होंने हर काम की रेट लिस्ट बना रखी है। यह अकेली एजेंसी नहीं, बल्कि एक सिंडिकेट है, जिसमें डिटेक्टिव एजेंसियों, मोबाइल कंपनी के कर्मचारी और बैंक कर्मियों की मिलीभगत है। इस सिंडिकेट का पर्दाफाश करने के लिए भास्कर रिपोर्टर ने जासूस एजेंसियों को एमपी के वरिष्ठ आईएएस अफसरों के नंबर दिए। इन्होंने बिना हिचकिचाहट कॉल डिटेल के सैंपल दिखाए और पूरी रिपोर्ट के लिए 20-40 हजार रुपए खर्च बताया। किसी व्यक्ति की सीडीआर निकालना गैरकानूनी है, इसलिए भास्कर रिपोर्टर ने इनसे सीडीआर देने की केवल डील की। साथ ही एक्सपर्ट से समझा कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से कितना बड़ा खतरा है। पढ़िए रिपोर्ट… ‘जासूस’ ने खोले अपने काले कारोबार के राज भास्कर टीम ने मनगढ़ंत कहानी के साथ इंदौर में ‘इंदौर डिटेक्टिव सर्विस’ चलाने वाले मुकेश तोमर और योगेश भेलवाल से संपर्क किया। उन्हें बताया कि एक महिला तहसीलदार को झूठे भ्रष्टाचार के मामले में फंसाया गया है। बहाली के नाम पर एक आईएएस दंपती और तीन दलालों ने उनसे 30 लाख रुपए ठग लिए हैं। अब वे लोग गायब हैं। उनकी लोकेशन, कॉल डिटेल और बैंकिंग जानकारी चाहिए। जासूस मुकेश तोमर को फर्क नहीं पड़ा कि केस सच्चा है या झूठा। उसका एकमात्र टारगेट पैसा कमाना था। रिपोर्टर: हमें कुछ लोगों की डिटेल निकलवानी है… वे मिल नहीं रहे, उनके पीछे एक आईएएस दंपती है। मुकेश तोमर: आप उनके नंबर दे दीजिए… हम आपको डिटेल, लोकेशन और अन्य जानकारी तो दे देंगे, लेकिन हम पकड़ कर नहीं देंगे। रिपोर्टर: हमें बस इनके अकाउंट की जानकारी, लोकेशन और कॉल डिटेल मिल जाए तो आगे का हम देख लेंगे। बैंकिंग ट्रांजैक्शन की जानकारी देने का ऑफर चंद मिनटों में तोमर ने दिए गए नंबरों की कुछ जानकारी निकालकर बता दी। उसने कहा- हम आपके नंबर की भी जानकारी निकाल सकते हैं। साथ ही जिन लोगों की जानकारी चाहिए, उनकी बैंकिंग जानकारी भी निकाल देंगे कि इन्होंने कहां-कहां और किस खाते में रुपए ट्रांसफर किए। हम उनकी पूरी चेन पकड़ सकते हैं। इनके कॉल रिकॉर्ड निकाल सकते हैं। उनके मूवमेंट और लोकेशन भी पता कर सकते हैं, जिनसे बात हुई, उनकी डिटेल भी निकाल देंगे कि ये कौन हैं और कौन इनके सपोर्ट में हैं। उसने दावा किया कि वह मोबाइल फोन से डिलीट डेटा भी रिकवर करा सकता है। जब काम की वैधता पर सवाल उठाया गया तो उसने और उसके साथी योगेश ने जो कहा, वह चौंकाने वाला था। 1.85 लाख रुपए में पैकेज डील सौदा तय होने पर इन जालसाजों ने वॉट्सएप पर औपचारिक बिल भेजा। यह बिल दिखाता है कि यह छोटा-मोटा अपराध नहीं, बल्कि संगठित कंपनी की तरह चल रहा धंधा है। जासूस एजेंसी ने तीन लोगों की 6 महीने की कॉल डिटेल के लिए 1 लाख 20 हजार रुपए चार्ज किए, यानी 40 हजार रुपए प्रति व्यक्ति। इसके अलावा बैंक स्टेटमेंट और ट्रांजैक्शन के एनालिसिस के लिए 15 हजार, टीडीएस और बैंकिंग रिटर्न के लिए 10 हजार और कोर इन्वेस्टिगेशन चार्ज के तौर पर 40 हजार रुपए चार्ज किए, यानी कुल डील 1 लाख 85 हजार रुपए में हुई। मैसेज के अंत में लिखा था- ‘यह हमारा बेस्ट ऑफर है, इससे कम में काम नहीं होगा।’ बातचीत के दौरान मुकेश तोमर ने अपने फोन पर एक CDR का सैंपल दिखाते हुए कहा, “इस तरह की सीडीआर आती है, ये नंबर आते हैं। डेट, टाइम, लोकेशन और टाइम ड्यूरेशन। बहुत आसान होता है हमें इस तरह से ट्रेस करना।” भास्कर टीम ने एक दूसरे ‘जासूस’ अनिकेत से संपर्क किया जो इसी तरह के नेटवर्क का हिस्सा है। इस बार कहानी एक आईएएस अफसर की थी, जिसकी कॉल डिटेल निकलवानी थी। रिपोर्टर: एक आईएएस अफसर की कॉल डिटेल निकलवानी है, जो सीएम हाउस में पदस्थ है। अनिकेत: हां, कॉल डिटेल निकल जाएगी… मिनिमम एक महीने की निकलेगी। दो से तीन दिन में निकलवा देंगे। रिपोर्टर: यह लीगल तो है? अनिकेत: नहीं… एक बात और बता देता हूं कि आप इसे कोर्ट केस में नहीं लगा सकते। यह लीगल नहीं है। ये जो आप कॉल डिटेल निकलवा रहे हैं। वह पूरी तरह इलीगल है। हम केवल आपकी मदद कर रहे हैं। अनिकेत ने बताया कि जहां कोर्ट को यह जानकारी निकालने में छह से सात महीने लगते हैं, वहीं वह यह काम दो से तीन दिन में कर सकता है। उसने रेट बताए- एक महीने के 12 हजार, तीन महीने के 20 हजार और छह महीने के 35 हजार रुपए। उसने दावा किया कि यह जानकारी केवल आईपीएस स्तर के अधिकारी ही निकाल सकते हैं। वह भी सरकारी अनुमति से। कैसे निकालते हैं डेटा? एजेंसियों का दावा है कि उनके पास ऐसे सॉफ्टवेयर और ‘इनसाइडर’ (भीतर के लोग) हैं, जिनकी टेलीकॉम कंपनियों और बैंकों के सर्वर तक सीधी पहुंच है। वे मुख्य रूप से यह जानकारी निकालते हैं: सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड): किस नंबर पर, किस समय, कितनी देर बात हुई? उस समय आपकी लोकेशन क्या थी? बैंक टीडीएस डेटा: आपके बैंक खाते में कितना बैलेंस है? कहां-कहां ट्रांजैक्शन हुए? आपने कितना टैक्स भरा है? वॉट्सएप ट्रैकिंग: ये लोग वॉट्सएप चैट और मीडिया फाइल्स तक निकालने का भी दावा करते हैं। यह एक बड़े ‘डेटा ब्रीच’ का संकेत है। साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर कोई प्राइवेट एजेंसी इतनी आसानी से आपकी फाइनेंशियल डिटेल निकाल रही है तो इसका मतलब है कि हमारे बैंकिंग और टेलीकॉम सिस्टम की सुरक्षा में बहुत बड़ी चूक है। कौन निकाल सकता है CDR? कॉल डिटेल केवल पुलिस या सरकारी एजेंसियां, वह भी अदालत के आदेश या उच्चाधिकारियों की मंजूरी के बाद ही हासिल हो सकती हैं। एसोसिएशन ऑफ डिटेक्टिव्स एंड इन्वेस्टिगेटर्स (ADI) के चेयरमैन एस वी जग्गा ने बताया- “कोई भी डिटेक्टिव एजेंसी किसी भी व्यक्ति की कॉल डिटेल नहीं निकाल सकती। यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो वे अपराधी हैं। उन्होंने कहा- यदि कोई सीडीआर निकाल रहा है तो वो कानून का दोषी तो है ही, हम भी उसकी मान्यता रद्द कर देंगे।
