जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मंगलवार को कहा कि अमरनाथ यात्रा को हमेशा कश्मीरी मुसलमानों ने आसान बनाया है और आगे भी बनाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि यात्रियों को लिए सुविधाएं आर्टिकल 370 के हटने के बाद ही आसान नहीं हुई हैं। कश्मीरियों ने हमेशा तीर्थयात्रियों को अपने कंधों पर उठाकर गुफा तक पहुंचाया है। कश्मीरियों के बिना यात्रा कब मुमकिन हुई है? मंगलवार को जम्मू कश्मीर विधानसभा में सीएम ने साल 2026-27 के लिए राज्य का बजट पेश किया। उन्होंने तीर्थक्षेत्र के विकास के लिए 180 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रस्ताव रखा। विपक्ष के दावे पर सीएम का जवाब अब्दुल्ला ने यह बात विपक्ष के नेता सुनील शर्मा के दावे के जवाब में कही। शर्मा ने कहा था कि अमरनाथ यात्रियों के लिए सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार का खास नियम अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 हटाने के बाद ही मुमकिन हुआ। इससे पहले, 2026-27 के लिए अपना बजट पेश करते हुए, अब्दुल्ला ने सदन को बताया था कि उनकी सरकार दक्षिण कश्मीर हिमालय में अमरनाथ मंदिर जाने वाले यात्रियों की सुरक्षा और आराम पक्का करने के लिए कमिटेड है। उन्होंने कहा कि सालाना तीर्थयात्रा के लिए 2025-26 के दौरान 200 से ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर के काम पूरे किए गए। उन्होंने बताया कि बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के साथ पार्टनरशिप में तीर्थयात्रा के इंफ्रास्ट्रक्चर को और मॉडर्न बनाने के लिए काम किया जाएगा। हर साल 3-5 लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं अमरनाथ गुफा अमरनाथ यात्रा आमतौर पर हर साल जून के अंत या जुलाई की शुरुआत से शुरू होकर अगस्त में रक्षाबंधन तक चलती है। ये लगभग 40-50 दिनों की अवधि होती है। इस दौरान हर साल 3 से 5 लाख से अधिक लोग बाबा बर्फानी के दर्शन करने के लिए पहलगाम और बालटाल के रास्तों से पहुंचते हैं। यात्रा के लिए श्राइन बोर्ड की वेबसाइट या चयनित बैंक शाखाओं के माध्यम से अग्रिम पंजीकरण अनिवार्य है। सुरक्षा के लिए 500 से अधिक अर्धसैनिक बलों की कंपनियां तैनात की जाती है और मार्ग पर जगह-जगह मेडिकल कैंप, भंडारे और ठहरने की व्यवस्था होती है। प्राकृतिक सौंदर्य के लिए पहलगाम रूट बेहतर यदि आप अमरनाथ सिर्फ धार्मिक यात्रा के रूप में आ रहे हैं तो बालटाल रूट बेहतर है। यदि कश्मीर के प्राकृतिक सौंदर्य को करीब से जीना चाहते हैं तो पहलगाम रूट बेहतर है। हालांकि इसकी हालत बालटाल रूट के विपरीत है। गुफा से चंदनबाड़ी तक सफर थकान, धूलभरा है। रास्ता पत्थरों वाला और कहीं-कहीं बहुत संकरा है। 48 किमी लंबे जर्जर रूट पर कई जगह रेलिंग गायब है तो कहीं घोड़ों के लिए अलग रास्ता है। 1. पहलगाम रूट: इस रूट से गुफा तक पहुंचने में 3 दिन लगते हैं, लेकिन ये रास्ता आसान है। यात्रा में खड़ी चढ़ाई नहीं है। पहलगाम से पहला पड़ाव चंदनवाड़ी है। ये बेस कैंप से 16 किमी दूर है। यहां से चढ़ाई शुरू होती है। तीन किमी चढ़ाई के बाद यात्रा पिस्सू टॉप पहुंचती है। यहां से पैदल चलते हुए शाम तक यात्रा शेषनाग पहुंचती है। ये सफर करीब 9 किमी का है। अगले दिन शेषनाग से यात्री पंचतरणी जाते हैं। ये शेषनाग से करीब 14 किमी है। पंचतरणी से गुफा सिर्फ 6 किमी रह जाती है। 2. बालटाल रूट: वक्त कम हो, तो बाबा अमरनाथ दर्शन के लिए बालटाल रूट से जा सकते हैं। इसमें सिर्फ 14 किमी की चढ़ाई चढ़नी होती है, लेकिन एकदम खड़ी चढ़ाई है, इसलिए बुजुर्गों को इस रास्ते पर दिक्कत होती है। इस रूट पर संकरे रास्ते और खतरनाक मोड़ हैं। ————- ये खबर भी पढ़ें… रेलवे का बड़ा फैसला:जम्मू-कश्मीर में 3 रेल प्रोजेक्ट रोके, सेब के 7 लाख पेड़ बचाने की कोशिश; स्थानीय लोगों ने जताई थी आपत्ति रेल मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित तीन परियोजनाओं को रोक दिया है। रेलवे ने दिसंबर 2023 में कश्मीर में तीन नई लाइनों के सर्वे को मंजूरी दी थी। ये रेल लाइनें थीं- सोपोर-कुपवाड़ा (33.7 किमी), अवंतीपोरा-शोपियां (27.6 किमी) और अनंतनाग-बिजबेहारा-पहलगाम (77.5 किमी)। हालांकि स्थानीय लोगों और सरकार की आपत्ति के बाद सर्वे रोक दिया गया है। पूरी खबर पढ़ें…
