आदमपुर छावनी में कचरा डंपिंग का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। तीन साल पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यहां कचरा डंप करने पर नगर निगम पर 1.80 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। इस पेनाल्टी को माफ कराने के लिए निगम सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, लेकिन जमीन पर हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ गए हैं। वर्तमान में यहा जमा लिगेसी वेस्ट (पुराना कचरा) एक विशाल पहाड़ बन चुका है, जिसे खत्म करने के लिए अब 55 करोड़ रुपए की दरकार है। हैरानी की बात यह है कि नगर निगम प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर जिम्मेदारी लेने से बच रहा है। एमआईसी ने परिषद को भेजे प्रस्ताव में कोई स्पष्ट अनुशंसा करने के बजाय निर्णय का भार पूरी परिषद पर डाल दिया है। इस प्रशासनिक ढुलमुल रवैये के बीच सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष शबिस्त जकी और पार्षद गुड्डू चौहान के नेतृत्व में मोर्चा खोल दिया है, जिससे आगामी परिषद की बैठक में भारी हंगामे के आसार हैं। इस विवाद का सीधा असर स्वच्छ सर्वेक्षण पर पड़ना तय है। इस वजह से बच रही है एमआईसी एमआईसी ने सीधे वर्क ऑर्डर जारी करने के बजाय प्रस्ताव परिषद को भेज दिया, जिसे जिम्मेदारी से बचने की रणनीति माना जा रहा है। एमपी नगर सड़क टेंडर मामले में 39 पार्षदों पर लोकायुक्त प्रकरण दर्ज हो चुका है, जिसमें वर्तमान महापौर भी शामिल हैं। आदमपुर छावनी में 33 करोड़ के टेंडर के मुकाबले 55 करोड़ का सिंगल टेंडर आया, बावजूद इसके एमआईसी अपने स्तर पर फैसला लेने से बच रही है। महाधिवक्ता की राय और अन्य शहरों से तुलना के बाद भी निर्णय लंबित है। पहले अयोग्य कंपनियों को काम दिया, अब गलत एस्टीमेट बनाया पूरा मामला संकेत देता है कि निगम आदमपुर छावनी सफाई को लेकर गंभीर नहीं है। पहले अयोग्य कंपनियों को काम दिया, अब गलत एस्टीमेट बनाया। 6.5 लाख टन कचरे के लिए 33 करोड़ तय हुए, जबकि कंपनी 55 करोड़ मांग रही है और फैसला टल रहा है। -केके श्रीवास्तव, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एक्सपर्ट
