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अमेरिकी नागरिकों को तुरंत ईरान छोड़ने की चेतावनी:वर्चुअल एंबेसी बोली- मदद का इंतजार न करें, खुद निकलें; ओमान में परमाणु मुद्दे पर आज बातचीत

अमेरिका ने ईरान में रह रहे अपने नागरिकों को तुरंत देश छोड़ने की सख्त चेतावनी दी है। वर्चुअल अमेरिकी दूतावास ने कहा है कि देश में सुरक्षा की स्थिति बेहद खराब हो गई है। बढ़ती अशांति, पाबंदियां और यात्रा में रुकावटें लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं। एम्बेसी ने साफ कहा है कि जल्द से जल्द ईरान छोड़ दें। अपने निकलने का प्लान खुद बनाएं और इसमें अमेरिकी सरकार की मदद पर भरोसा न करें। मौजूदा हालात में आधिकारिक सहायता बेहद सीमित है। ईरान में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और अशांति के कारण सुरक्षा व्यवस्था सख्त हो गई है। सड़कें बंद हैं, सार्वजनिक परिवहन ठप है, इंटरनेट और मोबाइल-लैंडलाइन सेवाएं बार-बार बाधित हो रही हैं। कई एयरलाइंस ने ईरान आने-जाने वाली उड़ानों को सीमित या रद्द कर दिया है, जिससे बाहर निकलना और भी मुश्किल हो गया है। इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता आज ओमान की राजधानी मस्कट में शुरू हो रही है। यह पिछले करीब नौ महीनों में दोनों देशों के बीच पहली औपचारिक बैठक है, जो जून 2025 में हुए संघर्ष के बाद से निलंबित थी। दूतावास ने दोहरी नागरिकता वाले लोगों के लिए ज्यादा खतरा बताया अमेरिकी चेतावनी में कहा गया है कि अगर तुरंत निकलना संभव न हो तो सुरक्षित जगह पर रहें। वहां खाना, पानी, दवाइयां और जरूरी सामान का स्टॉक रखें। इंटरनेट ब्लैकआउट जारी रहने की संभावना है, इसलिए परिवार और दोस्तों से संपर्क के लिए दूसरे तरीके सोचें। US एम्बेसी ने अमेरिका-ईरान की दोहरी नागरिकता रखने वाले लोगों के लिए ज्यादा खतरा बताया है। ईरान दोहरी नागरिकता को मान्यता नहीं देता, इसलिए ऐसे लोग ईरानी पासपोर्ट से ही बाहर निकल सकते हैं। अमेरिकी पासपोर्ट दिखाना या अमेरिका से जुड़ाव जाहिर करना ईरानी अधिकारियों के लिए हिरासत में लेने का कारण बन सकता है। ऐसे में पूछताछ, गिरफ्तारी या लंबी हिरासत का खतरा है। जो अमेरिकी नागरिक बिना वैध अमेरिकी पासपोर्ट के हैं, उन्हें ईरान छोड़ने के बाद नजदीकी अमेरिकी दूतावास से पासपोर्ट बनवाने की सलाह दी गई है। लोगों को प्रदर्शनों से दूर रहने और फोन चार्ज रखने की सलाह अमेरिकी सरकार ने साफ किया है कि ईरान में कूटनीतिक और कांसुलर संबंध न होने की वजह से वह अपने नागरिकों की मदद करने की स्थिति में नहीं है। अमेरिका के हितों का प्रतिनिधित्व तेहरान में स्विट्जरलैंड दूतावास करता है। रूटीन कांसुलर सेवाएं बंद हैं और हालात में सुधार के कोई संकेत नहीं दिख रहे, इसलिए अमेरिकी नागरिकों से खुद ही सुरक्षित निकलने की ठोस योजना बनाने की अपील की गई है। सुरक्षा के लिए कुछ जरूरी सलाह भी दी गई है, जैसे प्रदर्शनों और भीड़-भाड़ वाली जगहों से दूर रहें, फोन हमेशा चार्ज रखें, परिवार से संपर्क बनाए रखें और स्थानीय मीडिया पर नजर रखकर हालात की जानकारी लेते रहें। व्हाइट हाउस बोला- बातचीत नाकाम हुई तो ताकत का इस्तेमाल करेंगे हाई-लेवल वार्ता से पहले व्हाइट हाउस ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कूटनीति के पक्ष में हैं, लेकिन अगर बातचीत नाकाम होती है तो ताकत का इस्तेमाल करने के लिए भी तैयार हैं। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने गुरुवार को पत्रकारों से कहा कि ट्रम्प ओमान में होने वाली बातचीत में देखना चाहते हैं कि क्या कोई समझौता हो सकता है। साथ ही उन्होंने ट्रम्प की मांग दोहराई कि ईरान के पास जीरो परमाणु क्षमता होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर बातचीत से नतीजा नहीं निकला तो राष्ट्रपति के पास कई विकल्प मौजूद हैं। यूएस सेंट्रल कमांड ने पुष्टि की है कि ईरान के पास कैरियर स्ट्राइक ग्रुप 3 का प्रमुख जहाज, न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन (CVN-72) अभियानों में लगा हुआ है। अमेरिका ने ईरान के आगे 4 शर्तें रखी इस महीने की शुरूआत में अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने ईरान से समझौते के लिए 4 शर्तें बताई- बातचीत से पहले ईरान-अमेरिका के मतभेद अमेरिका और ईरान ने शुक्रवार को ओमान में बातचीत करने पर सहमति जताई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बड़े मतभेद हैं। यह बातचीत पहले तुर्किये में होनी थी, लेकिन बुधवार देर रात यह घोषणा की गई कि वार्ता का स्थान बदलकर मस्कट कर दिया गया है। हालांकि, इसकी वजह नहीं बताई गई है। अमेरिका ईरान के मिसाइल प्रोग्राम को भी वार्ता में शामिल करना चाहता है, जबकि तेहरान कह रहा है कि बातचीत सिर्फ परमाणु मुद्दे तक सीमित रहनी चाहिए। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची एक राजनयिक दल के साथ मस्कट पहुंच चुके हैं। अमेरिका चाहता है कि वार्ता में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और मानवाधिकार रिकॉर्ड पर भी चर्चा हो, लेकिन ईरान ने साफ कह दिया है कि वह केवल परमाणु मुद्दे पर ही बात करेगा। ईरान के विदेश मंत्री ट्रम्प के विशेष दूत स्टीव विटकोफ और सलाहकार जैरेड कुशनेर से मुलाकात करने वाले हैं। वार्ता से ठीक पहले ईरानी राज्य मीडिया ने बताया कि तेहरान ने रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स साइट पर लंबी दूरी की खोर्रमशहर-4 बैलिस्टिक मिसाइल तैनात की है। अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में तैनाती बढ़ा रखी है अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत करते हुए अरब सागर और लाल सागर में विमानवाहक पोत USS अब्राहम लिंकन, USS थियोडोर रूजवेल्ट और कई मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत तैनात किए हैं। साथ ही कतर, बहरीन, सऊदी अरब, इराक और जॉर्डन के सैन्य अड्डों से वायुसेना की सक्रियता बढ़ी है। अमेरिका अब ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य अड्डों व कमांड सेंटरों पर समुद्र और आसमान दोनों से हमले की स्थिति में आ गया है। ईरान के खिलाफ पहले कार्यकाल से आक्रामक रहे ट्रम्प ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल (2017-2021) में ईरान के साथ 2015 के परमाणु समझौते संयुक्त व्यापक कार्य योजना ( JCPOA) से अमेरिका को पूरी तरह बाहर निकाल लिया था। यह समझौता ओबामा प्रशासन के समय में जुलाई 2015 में हुआ था, जिसमें ईरान, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन और यूरोपीय संघ शामिल थे। समझौते के तहत ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियों पर कई सख्त सीमाएं लगाई थीं। इसके बदले में ईरान को अमेरिका और अन्य देशों ने लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों में छूट दी, खासकर तेल निर्यात, बैंकिंग और व्यापार पर। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था को फायदा हुआ था। ट्रम्प ने चुनाव प्रचार में ही इस समझौते को दुनिया का सबसे खराब समझौता कहा था। उनका कहना था कि यह समझौता ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा को सिर्फ टालता है, खत्म नहीं करता। ईरान ने समझौते में बुरे इरादे से हिस्सा लिया और पहले अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम छिपाया था। उन्होंने कहा था कि समझौता ईरान के अन्य बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी ग्रुप्स को समर्थन, आतंकवाद और अमेरिकियों की हिरासत पर रोक नहीं लगाता। 8 मई 2018 को ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में जॉइंट कॉन्प्रीहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) से बाहर निकलने की घोषणा की। इसके साथ ही उन्होंने उन सभी प्रतिबंधों को फिर से लागू कर दिया जो समझौते के तहत हटाए गए थे। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति अपनाई, जिसके तहत- मिडिल ईस्ट में 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक तैनात मिडिल ईस्ट (CENTCOM) में अभी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी काफी मजबूत है। मिडिल ईस्ट और पर्शियन गल्फ में लगभग 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। फिलहाल मिडिल ईस्ट में करीब 6 नौसैनिक जहाज मौजूद हैं, जिनमें 3 गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर शामिल हैं, जो बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस और अन्य ऑपरेशन के लिए सक्षम हैं। ईरान पर पहले भी हमला कर चुका है अमेरिका ईरान ने बातचीत की इच्छा जताई है, लेकिन शर्तों को सिरे से खारिज कर दिया है। ट्रम्प ने जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमलों का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि तीन सुविधाओं पर हमले से ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह नष्ट हो गई है। ये ठिकाने फोर्डो, नतांज और इस्फहान थे। उन्होंने कहा, “22 साल से लोग यह करना चाहते थे।”

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